Suraj Prakash
 
मैं बहुत अरसे तक इस भ्रम में रहा कि मैं औरों से बेहतर इन्सान हूं। सही समझ रखता हूं, सही वक्त पर सही फैसले करता हूं और संतुलित जीवन जीता हूं। मैं ये भी मान कर चलता रहा कि मैं टुच्चा तो नहीं ही हूं बेशक कुछेक कमज़ोरियां मुझ में रही हों। मैं इस मु्गालते में भी रहा कि जिस तरह मैं अपनी निगाह में बेहतर इन्सान हूं, दूसरों की निगाह में भी मैं उतना ही श्रेष्ठ, बेहतरीन और अनुकरणीय हूं।
ैंने देर से लिखनाशुरू किया लेकिन इतना काम कर लिया है‍कि अब देरी से लिखने का मलालनहीं सालता। बेशक चालीस के करीब कहानियां लिखी होंगी अब तक मेरे पांचकहानी संग्रह हैं - अधूरी तस्वीर (1992), छूटे हुए घर – (2002), खो जाते हैं घर 2012, मर्द नहीं रोते 2012 और छोटे नवाब बड़े नवाब 2013।

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