Suraj Prakash
 
मैं बहुत अरसे तक इस भ्रम में रहा कि मैं औरों से बेहतर इन्सान हूं। सही समझ रखता हूं, सही वक्त पर सही फैसले करता हूं और संतुलित जीवन जीता हूं। मैं ये भी मान कर चलता रहा कि मैं टुच्चा तो नहीं ही हूं बेशक कुछेक कमज़ोरियां मुझ में रही हों। मैं इस मु्गालते में भी रहा कि जिस तरह मैं अपनी निगाह में बेहतर इन्सान हूं, दूसरों की निगाह में भी मैं उतना ही श्रेष्ठ, बेहतरीन और अनुकरणीय हूं।
यार दोस्‍त

 

 

» धीरेन्द्र अस्थाना मेरा सबसे पुराना साहित्यिक सहयात्री

» प्रवासी कहानीकार अस्‍पताल में

» बुकर प्राइज़ की जगह देखना चाहते हैं तेजेन्द्रे कथा यूके सम्मान को

» मनोज रूपड़ा

» अल्‍पना मित्र